महक

जीवन एक ऐसी रचना है जो सदा महकती रहती है। जिस प्रकार जीवन प्रारंभ से लेकर अन्त तक कई आकार और रुप बदलता रहता है, उसी प्रकार उसकी महक का आभास और प्रभाव बदलता रहता है। सत्य के अतिरिक्त इस सृष्टि में कुछ भी स्थायी नहीं। सत्य का रुप और आकार कभी नहीं बदलते। सत्य कभी नष्ट नहीं होता, लेकिन सत्य की महक का आभास और प्रभाव सब पर एक सा नहीं होता। समय की धारा आदि से अनन्त की ओर सदा गतिशील रहती है। समय की गति कभी नहीं बदलती मगर उस गति का आभाष बदलता रहता है। गति का आभाष जीवन दशा पर आधारित है, उसी प्रकार जीवन की महक का आभास जीवन की दशा पर निर्भर करता है।
माँ के गर्भ में जीवन का आरम्भ नारी को ममता की महक से भाव विभोर कर दता है। नारी जीवन पूर्णता के आभास से महक उठता है। पिता के अन्र्तमन में आनन्द की लहरें वर्तमान की नाव को ऐसे महकाती हैं कि भविष्य के किनार स्वागत की महक से चमकने लगते हैं। शिशु आगमन की किलकारियों से आंगन महकने लगता है। शैशव की मासूम मुस्कान द्रष्टा के तन मन को महका देती है। रुदन की सरगम कत्र्तव्य राग को जन्म देती है। तभी सुनने वाले अपनी सुध-बूध भूलकर रुदन को शान्त करने के लिए एक साथ उस ओर ऐसे जाते हैं, जैसे गुनगुनाती सागर की लहरें किनारे की ओर। मानव की कर्तव्य परायणता को देख कण-कण महक उठता है।

ये बेसबब सी ज़िन्दगी

ये बेसबब सी ज़िन्दगी
हम बेक़दर जीते रहे
खूने—जिगर करते रहे
खूने—जिगर पीते रहे

गर्दिशों की महफ़िलों में
हम खो गये थे इस क़दर
हादसों के क़ाफ़िलों में
हम गुमशुदा जीते रहे

मुश्क़िलों की साज़िशों ने
हमको कभी फुर्सत न दी
इस जहां की हर खुशी से
हम बेख़बर जीते रहे

खुद के लिए जीना यहां
हमने कभी सीखा नहीं
बेख़ुदी में सबके लिए
हम बेख़बर जीते रहे

मजबूर थे, लाचार थे
खामोश सब सहते रहे
उनकी जफ़ा के जाम में
ज़हरे—जफ़ा पीते रहे

वीरान थीं राहें मेरी
चलना बड़ा दुश्वार था
शायद कभी मंज़िल मिले
चलते रहे, जीते रहे

कुछ तो कहो दिल की लगी
हमसे जहां कहता रहा
ख़ामोशियों की क़ैद में
चुप सी लगा जीते रहे

ख़ामोशियों की कैद में
चुप सी लगा जीते रहे

— मोही नैय्यर

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