घटाएं

रुबाईयों का यह संग्रह पेश करते हुए मैं न तो शायर और न ही कोई कवि होने का दावा कर सकता हूं. हां एक इंसान बनने की कोशिश में कुछ खून की बूंदें गम और तड़प की गर्मी से तप कर दिल के वीरान आसमां में घटाएं बनकर बिखर गईं. अश्कों की नमी से तर कुछ घटाएं, कलम के होठों से कागज की जमीं पर उतर आईं.

इस बात का एहसास होते हुए कि यह जिन्दगी मेरी अपनी नहीं या कि सिर्फ मेरे लिए नहीं, यह औरों के लिए दी हुई खुदा की नेहमत है, यही सोचकर कि जो मैंने इस ज़िन्दगी से पाया जहां तक हो सके औरों की नजर कर दूं, इसी ख्याल से ये रुबाईयां आपकी नजर करता हूं.

शायद आप के दिल में ख्याल आये कि इस संग्रह का नाम ‘घटाएं’ क्यों? आसमानों में तैरती घटाएं कई तरह की होती हैं. कुछ घटाएं काली होती हैं, कुछ उजियाली, और कुछ धुंधियाली. कभी सावन की काली घटा को देखकर दिल तड़प उठता है तो कभी महक जाता है.

फर्क सिर्फ दिल के विरही होने या मिलन के आगोश में होने का है. कभी नीले आसमानों में टहलती उजियाली घटाएं मन को भा जाती हैं. उनका आवारापन और उजियाला बदन इश्क़ में कैद दिल को तड़पा जाता है. धुंधियाली घटाएं अक्सर इन्सान की जिन्दगी का दर्पण बन बेबसी, बेकरारी, मायूसी और पशेमानी का अक्स पेश करती हैं. और कभी कामयाब इन्सां धुंधियाली घटा को देखकर ‘हूं’ कह और सर उठा रोशनी की तरफ बढ़ जाता है. धुंधियाली घटा के न होने का एहसास दिलाता है. मेरी ये रुबाईयां भी इन काली, उजियाली और धुंधियाली घटाओं की तरह हैं. इनमें से शायद कोई आपके दिल को तड़पा जाये, महका जाये, कसका जाये या बेअसर जाये.

कुछ घटाएं बरसती हैं तो कुछ गरजती हैं. कुछ बरसती हैं और गरजती भी हैं. कुछ बिना बरसे, बिना गरजे एक छोर से दूसरे छोर तक खामोश टहलती हुई बेसबब ज़िन्दगी का उन्वान बन जाती हैं. कुछ घटाएं, फुहार लाती हैं तो कुछ सैलाब. कुछ घटाएं बिना बरसे सहरा में झुलसते राही के लिए साया बन ठंडक का सबब बन जाती हैं. कुछ घटाएं बर्क़ बन के आशियां जला देती हैं तो कुछ बर्क़ बनके गफलत की नींद से जगा देती हैं. मेरी ये रुबाईयां भी इन्हीं घटाओं की तरह हैं. इनमें से शायद कोई फुहार बन रुह और जिस्म को छू ले, कोई लफ़्जों के लिबास में ‘जो गरजते हैं बरसते नहीं’ बादलों की तरह बेमानी निकलें, कोई दिल की दुनिया में सोये जजबातों को अश्कों का सैलाब बना दें, कोई आरजूओं के सहारा में ठंडी आह बन दिल को सहला दे और हो सकता है कि कोई बर्क़ बनके फ़िराक और वस्ल की दुनिया में आग लगा दे.

कुछ घटाएं छोटी होती हैं, कुछ बड़ी और कुछ आसमानों में पूरी तरह छा जाती हैं और कभी-कभी घटाएं जमीं को भी छू लेती हैं. मेरी ये रुबाईयां भी इन्हीं घटाओं की तरह हैं. इनमें से शायद कुछ आपके जजबातों को सर से पा तक छू जायें तो हो सकता है कि कुछ अनछुए बादल या घटा की तरह यूं ही आपकी नजरों के सामने भटक जायें.

मेरी ये रुबाईयां इन्हीं घटाओं की तरह आपको जैसी भी लगे मुझे लिख भेजें. मैं आपके बयां का तहे-दिल से शुक्र-गुजार हूंगा.