काव्य कलश

भक्त कलश में जल अथवा गंगाजल भर कर प्रभु की आराधना करने हेतु मंदिर में प्रवेश करता है. भक्त की भक्ति भावना से वो जल पावन हो जाता है. वो उस जल को अपने प्रभु की मूर्ति पर छिड़क कर, वंदना करके, प्रभु के नाम का उच्चारण करते हुए स्वयं पर भी छिड़क कर अपने अस्तित्व को पावन कर लेता है. भक्त की श्रद्धा और उसकी आस्था उसके अन्तःकरण को एक अदभुत विश्वास से भर देती हैं. वो विश्वास उसे प्रभु के आशीर्वाद का ऐसा कवच पहना देता है कि भक्त भक्ती भाव में लीन हो इस संसार की विपदाओं से स्वयं को सुरक्षित समझता है. विश्वास, श्रद्धा, आस्था और भक्ती उसे भय मुक्त कर देते हैं.

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